हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक़, आयतुल्लाह अल-उज़्मा जवादी आमोली ने घर में नमाज़, दुआ और मुनाजात के लिए एक मख़सूस जगह मुक़र्रर करने की अहमियत बयान करते हुए कहा है कि मुसल्ला महज़ नमाज़ की जगह नहीं बल्कि इसके इंसान पर रूहानी असरात भी मुरत्तब होते हैं।
आयतुल्लाह अल-उज़्मा जवादी आमली ने तफ़सीर-ए-सूरह-ए-हिज्र के दरस की उन्नीसवीं नशिस्त में नमाज़ की जगह "मुसल्ला" के मानवी मक़ाम की तरफ़ इशारा करते हुए अहल-ए-ख़ाना को घर में नमाज़ और इबादत के लिए एक मख़सूस जगह मुक़र्रर करने की तरग़ीब दी।
उन्होंने फ़रमाया कि अगर घर में सुहूलत हो तो एक कमरा नमाज़ के लिए मख़सूस किया जाए, जहाँ घर के अफ़राद नमाज़, दुआ और मुनाजात अदा करें, और अगर अलग कमरा मुख़्तस करना मुमकिन न हो तो घर के किसी हिस्से में एक मुआय्यन जगह को नमाज़ व इबादत की जगह क़रार दिया जाए और हमेशा उसी जगह नमाज़ अदा की जाए।
आयतुल्लाह जवादी आमोली ने मज़ीद फ़रमाया कि दीनी रिवायात में मुसल्ला के रूहानी असरात की तरफ़ इशारा मिलता है; यहाँ तक कि अगर किसी मुह्तज़िर की जान कनी दुश्वार हो तो उसे उस जगह ले जाने की सिफ़ारिश की गई है जहाँ वह घर में नमाज़ पढ़ा करता था, क्योंकि वहाँ उसके लिए जान देना आसान होने की उम्मीद होती है।
उन्होंने इस सिलसिले में ताकीद करते हुए कहा कि इबादत के लिए एक मख़सूस जगह मुक़र्रर करना, अगरचे बज़ाहिर एक मामूली अम्र महसूस होता है, लेकिन इसके मानवी असरात से ग़ाफ़िल नहीं होना चाहिए।
मख़ज़: तफ़सीर-ए-सूरह-ए-हिज्र, आयतुल्लाह अल-उज़्मा जवादी आमोली, दरस नंबर 19।
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